Tuesday, April 6, 2010

कोलकाता अर्थात कलकत्ता

इस बार भारत के एक और महानगर के दर्शन करने का सुख प्राप्त हुआ. इन्सान की आदत होती है. तुलना करने की. तो मैंने भी कलकत्ता की तुलना दिल्ली और अन्य शहरों से करनी शुरू कर दी. पर हर शहर की अपनी कुछ खासियत होती है और उन पर गौर करना आवश्यक है. कलकत्ता जहाँ ईस्ट इण्डिया कंपनी ने अपना उपनिवेश बनाया था तो कुछ सोंच कर ही बनाया होगा. मेरी कंपनी का गेस्ट हाउस साल्ट लेक सिटी में है जिसका इतिहास शायद तीस साल से अधिक नहीं है. तो मानी बात है मेरा वास्तविक शहर से कोई बहुत ज्यादा वास्ता नहीं रहा. कई जगह पढ़ा था कलकत्ता भारत का सबसे प्रदूषित शहर है. पर मुझे शुरुआत के १० दिन कोई खास प्रदूषण नहीं दिखाई पड़ा. बल्कि कुछ मामलों में कलकत्ता मुझे दिल्ली से अच्छा लगा. यहाँ पर ज़िन्दगी जीने के लिए बहुत ज्यादा कमाने की जरुरत नहीं है. चीज़ें सस्ती हैं. खाना सस्ता है. रहना सस्ता है. कहीं भी आना जाना सस्ता है. लोगों के रहन सहन, उनके बात करने के अंदाज़ से लगता है की इस शहर में लोगों के पास बहुत फुर्सत है. यहाँ पर ज़िन्दगी मुंबई या दिल्ली की तरह भाग नहीं रही है.
मैं एअरपोर्ट पर शाम को लगभग साढ़े पांच बजे उतरा. वहां से टैक्सी करके अपने आश्रय तक आया. (बता दूँ आश्रय मेरे गेस्ट हाउस का नाम है. मैं क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग नहीं कर रहा हूँ) उसके बाद तीन दिन का ऑफिस. शनिवार को मौका मिला कलकत्ता के दर्शन करने का. मुझे लोगों ने सलाह दी कि यहाँ पर पार्क स्ट्रीट ज़रूर देखना. मैंने सोंचा सबसे पहले पार्क स्ट्रीट ही देखते हैं. वहां पर राष्ट्रीय संग्रहालय भी है. खैर मैं निकल लिया अपनी पार्क स्ट्रीट कि यात्रा पर. किसी भी शहर को महसूस करना हो तो उस शहर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट से यात्रा करो. मैंने भी नगर बस सेवा का लाभ उठाया. आप नयी जगह जायें और रास्ता न भटकें ऐसा कैसे हो सकता है. मैं भी भटका पर भटकना मेरे लिए अच्छा ही रहा.
रास्ते में मुझे राष्ट्रीय संग्रहालय मिल गया. कुछ वीथियों को देख कर तो ऐसा लगा जैसे सारा सामान यहाँ पर ठूँस दिया गया है. बड़ी ही बेतरतीबी से सामान बिखरा हुआ था. पर मैंने ऐसी बहुत सी चीज़ें देखने को मिली जिनको मैंने आज तक नहीं देखा था. बड़ा अच्छा अनुभव था. ममी थी जिसकी पट्टियाँ खुल चुकी हैं. शोकेस के शीशे इतनी बुरी तरह घिस चुके हैं की उनके अंदर क्या है साफ़ दिखाई भी नहीं देता है. जीवाश्म इतने सारे हैं की लगता है सारी चट्टानें खोद कर यहीं इकठ्ठा कर दी गयी हैं. जहाँ पर तसवीरें लगी हुई है वहाँ पर रौशनी की बहुत कमी है. संक्षेप में यह संग्रहालय बहुत बड़ा है और बहुत अच्छा है पर दुर्भाग्य कि कोई देखरेख नहीं है.
लगभग ३ घंटे बाद मैं यहाँ से निकल लिया. इसके बाद मेरा एक सूत्रीय कार्यक्रम सड़कों पर भटकना था. काफी समय तक मैंने ये काम किया. सड़कों पर भटकना और कुछ कुछ खाते रहना. पूरी तरह से थक जाने पर मैंने सोंचा कि अब वापस लौटना ठीक रहेगा.
इसके बाद फिर से पांच दिन का काम. मुझको कलकत्ता में खाना बहुत अच्छा लगा. जितने दिन रुका गेस्ट हाउस में शायद ही कुछ दिनी खाया हो. सारा समय तो बाहर ही खाते बीता. आगर आप बहुत ज्यादा सफाई को लेकर जागरूक नहीं है तो आप आराम से २०/२५ रूपये में भर पेट खाना खा सकते हैं. लोगों ने मुझे सलाह दी कि साल्ट लेक सिटी में एक मॉल है. उसे घूम आओ पर एक तो मैं अकेले और दूसरा मॉल तो आज हर शहर में ढेर सारे खुल गए हैं. तो मेरा कुछ मन नहीं हुआ किसी मॉल में घूमने का. शनिवार को फिर से मौका मिला कलकत्ता दर्शन करने का. मैंने सोंचा शनिवार को विज्ञान केंद्र घूमा जाये. बहुत कुछ देखा बहुत देर घूमा.
रविवार को मेरा मेरे मित्र के साथ दक्षिणेश्वर जाना निश्चित हुआ. ये मेरा कलकत्ता शहर से पहला साक्षात्कार था. यही कह सकता हूँ अभी तक मैंने जो कुछ शहर देखा था वह कोलकाता था अर्थात नया शहर. आज मैं कलकत्ता देखने जा रहा था. मेरे मित्रवर ने मुझसे एक उल्त्दन्गा नाम कि जगह पर मिलना तय किया. मैं लगभग एक घंटे पहले पहुँच गया. यहाँ पर मुझे पहली बार कलकत्ता के दर्शन हुए. गन्दगी का साम्राज्य. बस इतना ही बोल सकता हूँ. जनसँख्या घनत्व मुझे सबसे ज्यादा कलकत्ता में देखने को मिला. हालाँकि लोग कहते हैं कि मुंबई सबसे ज्यादा घना बसा हुआ शहर है. शायद मैंने मुंबई शहर का वह भाग नहीं देखा जहाँ के लिए मुंबई शहर सबसे घनी आबादी वाले शहर के रूप में मशहूर है. खैर अगर हम दिल्ली से तुलना करें तो कलकत्ता बहुत ही ज्यादा घना बसा हुआ शहर है. पतली पतली सडकें जिन पर ऑटो वाले इस कदर चलते हैं कि पिक्चर के स्टंट मैन तक घबरा जायें. अपने आगे किसी को मानते ही नहीं. कई जगह तो मुझे ऐसा लगा कि यहाँ पर कार और बस वाले ज्यादा डर के चलते हैं. मेरे मित्र का कमेन्ट था "यहाँ पर हर कोई अपने बाप कि सड़क समझ कर गाड़ी चलाता है". एक और चीज़ जो मुझे काफी विचित्र सी लगी वह थी यहाँ पर लोगों के पास अपनी गाडियां बहुत कम है. ज्यादातर लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करते हैं. शायद सड़क पर खुद गाड़ी चलाने का रिस्क कोई लेना नहीं चाहता है. और एक तरह से शहर कि व्यवस्था के लिए यह सोंच अच्छी ही है. अगर सब लोग अपनी कार लेकर सड़क पर आ जायेंगे तो शायद सड़क पर किसी के चलने की जगह नहीं बचेगी.
दक्षिणेश्वर मंदिर अच्छा है. हालाँकि विशाल नहीं है पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस की वजह से ऐतिहासिक महत्ता है. वाहन से हम लोग नाव से बेल्लूर मठ गए. पर वह हमारे पहुँचने तक बंद हो चुका था.
वापस दिल्ली लौटने के एक दिन पहले मैंने सियालदह के भी दर्शन कर लिए. वही पुरानी कहानी बहुत ज्यादा भीड़. इस प्रकार हमारी कोलकाता से कलकत्ता तक कि यात्रा समाप्त हुई. और मैं वापस दिल्ली आ गया.